Friday, November 11, 2022

राम.....पुरुषोत्तम राम

 पुरुषोत्तम.... पुरुषों में सबसे श्रेष्ठ । भारत के इतिहास में हजारों महान विभूतियों , सन्तों , गुरुओं , ईश्वरीय रूपों , महान राजाओं , ऋषियों , ज्ञानी - विज्ञानियों का जन्म हुआ पर भारत की सभ्यता ने पुरुषोत्तम नाम दिया केवल एक को....मेरे राम को ।


राम....जो भारत के प्राण है , राम बिन सब सुना है । जन्म पर भी राम , मरण पर भी राम , मिलने पर भी राम और विदाई पर भी राम , सुख में भी राम और दुख में भी राम ।


एक  जनप्रिय राजकुमार जो राजा बनने से एक दिन पूर्व बिना किसी मोह के  वन वास के लिये निकल पड़े , राजा बनने का भी वही भाव था जो माँ- पिता आदेश पर वन जाने का । चार भाइयों का स्नेह इतना कि एक सेवा के किया साथ चल पड़ा और दूसरा राज्य मिलने के बाद भी राम प्रेम में सिंघासन ठुकरा कर 14 वर्ष धरती पर भी गड्डा खोद कर सोया । पत्नी इतनी समर्पित की राजा की पुत्री होकर भी अपने हमसफर के साथ वन में चल पड़ी ।


राम... महल से चले तो अपने मित्र निषाद राज के मेल से , वनों में बसे ऋषियों , वनवासियों , के प्रेम को समेटते हुए , वनवासी मां शबरी के झूठे बेरों का प्रसाद , वन के हुनमान - जामवंत का  प्रेम , विश्वास , समर्पण ले , विश्व की तात्कालिक महाशक्ति रावण को पराजित करते हैं , जहाँ का राज्य जीता वहीं के व्यक्ति को समर्पित किया । युवा अवस्था मे राज्य गया , राजकुमारी के साथ वन में निकले , वन में पत्नी का हरण हुआ , सब कुछ दाव पर लगा पर जिन्होंने अपना संयम , स्नेह , नीति , अपना धैर्य , अपना अनुशासन नहीं छोड़ा....वापस लौटे तो सर्वप्रथम उस माँ से मिले जिसने उन्हें राजा से वनवासी बना दिया था । 


वन गये थे तो राजकुमार राम थे ,पर लोटे तो भगवान राम थे....प्रजा, जन क्षेत्रो के निवासियों का स्नेह , वनवासियों का अगाथ   लगाव , साथ ले कर लोटे ।


राम मतलब पूर्णता , राम मतलब धैर्यता , राम मतलब नीति , राम मतलब सहनशीलता , राम मतलब विनम्रता ,राम मतलब पुत्र - भ्राता - पति - पिता - राजा - मित्र के कर्तव्यों से पूर्ण , राम मतलब इंसान के भगवान होने का सफर .....और मेरे जैसों के लिये राम मतलब पूर्ण ब्रह्म ।


श्रेष्ठ वही है जो हर परिस्तिथि में सम भाव बनाये रखे ....तभी तो भारत के हर चेतन्य विचार ने राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा और साकार- निराकार हर विचार ने राम को ही मुक्ति मार्ग । राम नाम ने उन सब को तारा है  जो राम नाम के हो गये और उन्हें भी जो राम नाम से राम नाम ले अलग हो गये ....आखिर राम , राम जो ठहरे ।


Sunday, January 23, 2022

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस.... जन्म जयंती और यादें ।

नेताजी  सुभाष चन्द्र बोस......नाम ही काफ़ी है ,रोम रोम में देश भावना प्रवाहित करने के लिये । आजादी का अमर मतवाला ,जिस ने आजादी के समर की धारा ही बदल दी । अकेला चल पर ,विदेशी भूमि पर एक विशाल सेना का निर्माण ,प्रथम आजाद भारत सरकार का निर्माण ...9 विदेशी सरकारों से मान्यता और भारत की तात्कालिक सेना में  चिंगारी का प्रवाह.......सुभाष नाम ही काफी है ।

23 जनवरी यादों से भरा है ,कॉलेज समयकाल में आजाद हिन्द सेना के नाम से संगठन का  गठन और 23 जनवरी को सुबह से शाम तक विविध कार्यक्रमों का आयोजन ....लगता था जैसे कोई महापर्व मना रहे हैं। 

लगभग 15- 16 साल पूर्व तक , जब तक नॉकरी के लिये बाहर न निकलना पड़ा था....लगभग एक माह पूर्व से भी 23 जनवरी के कार्यक्रमों की तैयारी प्रारम्भ होती थी....योजना व वित्त की भी । पर नेताजी के नाम से सब में जोश अथाह रहता था ।

प्रातः वैदिक यज्ञ, फिर स्कूली विद्यार्थियों के साथ शोभायात्रा , अस्पताल में सेवा कार्य , और सायं काल मे ,राजगढ़ के ऐतिहासिक कुंड पर दीपदान..... सुभाष के जयकारों के बीच पूरा दिन विविध आयोजनों के साथ निकल जाता था । विद्यार्थी जीवन मे सुभाष चन्द्र बोस के नाम पर विद्यार्थियों का एकत्रीकरण , कार्य करने का जज्बा स्वतः प्रकट हो जाता था । जेब मे पैसा नहीं पर , कार्य करना है तो करना है.....बस इसी जिद के चलते टोली के सामने , वित्त का अभाव भी हार मानता था । कहीं से मांग कर टेक्टर या जुगाड़ की व्यवस्था...टेंट वाले से सफेद चद्दर की धुलाई के आधार पर निःशुल्क सामान और कहीं से माइक की बैटरी....जब मांग कर ।

अब केंद्र सरकार द्वारा इंडिया गेट के सम्मुख नेताजी की मूर्ति लगाने का निर्णय हुआ है, उस स्थान में इन से ज्यादा उपयुक्त कौन होगा । 125 वीं जन्म जयंती पर ...काश नेताजी से जुड़े अन्य रहस्य भी जनता के सामने खोले जायें ।

सुभाष न शब्दों में समेटे जा सकते हैं और न ऐसी कोशिश करनी चाहिये..... ये तो वे हैं जिन्हें आजादी के बाद भी गुमनाम छोड़ने की कोशिश हुई पर  वे प्रखर सूर्य की रोशनी की तरह , सच्चे भारतीयों के ह्रदय में राष्ट्र भक्ति की रोशनी जलाते रहे और जलाते रहेंगे ।






Monday, December 13, 2021

संकल्प सिद्धि..... काशी गौरव

आज का दिन है संकल्प सिद्धि का....गौरव को पुनः गौरवान्वित करने का 

सत्तायें कभी स्थाई नहीं होती और भारत सभ्यता में राजा कभी इतिहास के केंद्र बिंदु नहीं रहे... भारत इतिहास - सभ्यता केवल उनको अपने अंदर स्वर्णिम शब्दो मे जगह देता आया है जिन्होंने भिन्नता के साथ इतिहास को नई दिशा दी हो ।

शायद परम् सत्ता की ही कृपा है कि वर्तमान इतिहास में एक चयनित प्रशासक ,भारत की सभ्यता को  उसके गौरव के साथ पुनः स्थापित कर रहे हैं ....


अयोध्या में श्री राम मंदिर शिलान्यास...
काशी में काशी विश्वनाथ मंदिर का नये रूप में रूपांतरण का उदघाटन....

यूँ ही हर किसी के भाग्य में इतने बड़े कार्य करने का समय नहीं आता है ,कुछ तो है निराला ही...

प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री कई बने और कई बनेंगे पर मोदी जी और योगी जी........ महारानी अहिल्या बाई होल्कर  , महाराजा रणजीत सिंह , सरदार पटेल के साथ आप भी भारत की सभ्यता को पुनः उसके गौरव में स्थापित करने के लिये सदा सदा के लिये अजर अमर हो गये ।

विदेशी आक्रांताओं ने हमारे धर्म-सभ्यता स्थानों को चुन चुन कर निशाना बनाया था.... उनका ध्येय किसी धर्म को कुचलने से ज्यादा हमारी आस्था- विश्वास- गौरव पर चोट  पहुँचाना था....वे कुछ हद तक सफल भी रहे ...पर मोदी- योगी की जोड़ी ने पुनः समय चक्र को घुमाया है , अयोध्या के बाद काशी... गौरव की पुनः स्थापना है  ।
मन आनंदित है ।

हर हर महादेव ।

Friday, November 19, 2021

कृषि कानून....बस भारत जीत जाये ।

अनावश्यक रूप से लाया गया अध्यादेश  व बने कानून ,अनावश्यक  प्रक्रिया से रद्द हो गये ।

क्या बचा....??

पिछले साल केंद्र सरकार के द्वारा  अध्यादेश के माध्यम से बनाये गये तीन कानून ,जिसके चलते पिछले लगभग 400 दिनों से देश में एक वर्ग आंदोलन करता रहा । आंदोलन को राजैनतिक वर्ग ने  हथिया लिया , खालिस्तानियों के झंडे लहराये गये ....गणतन्त्र दिवस पर लाल किले पर आतंक फैलाया गया । हाइवे  दबाये  गये..... कितने किसान इस आंदोलन के नाम पर बीमारी ...आत्महत्या के कारण मृत्यु को प्राप्त हुए ....व्यापारों को नुकसान हुआ पर आंदोलन चल रहा था....क्या क्या नहीं हुआ.....देश मे आंदोलन था और देश विदेश की का हर अजूबा आंदोलन के माध्यम से अपना हित साध रहा था.....कोई कोई तो बक्कल ही उतार रहा था ।

अपना तो पहला ही मत था कि इस तरह कानून आना नहीं चाहिये था, आ गया तो वापस नहीं होना चाहिये था.....पर एक प्रश्न जरूर था....क्या करें जब आंदोलन किसी समाज या वर्ग का बन गया ? क्या करें जब आंदोलन को संवेदनशील आधार से जोड़ दिया गया ? जिन के पास सैकड़ों बीघा की खेती है , आनन्द है वे .…..चलो छोड़ो ।

आज गुरु नानक देव जी के जन्मोत्सव पर प्रधानमंत्री ने खुद इन कानूनों को वापस लेने की घोषणा कर दी .....कुछ ने कहा रणछोड़ , किसी ने कहा हार गये , तो किस ने कहा बहुत बढ़िया ....अपना अपना नजरिया और अपना अपना विचार ।

पर जब एक पूर्ण बहुमत की सरकार का प्रधानमंत्री कहे कि.... माफी और शायद वे लोगों को समझा नहीं पाये .....किसानों के लिये बिल था और राष्ट्र के लिये वापसी है.....तो समझ जाइये की राजनैतिक रूप से ज्यादा विषय ओर भी है । जो भी हो..... वैसे मेरा मानना है इस आंदोलन से कुछ चीजें स्पष्ट हुई:-

1) हमारे देश मे अभी भी वाम मार्गी आंदोलन प्रभावी है
2) देश के अंग भंग करने वाली इच्छा शक्ति सक्रिय है
3) आंदोलन को जाती - समूह से जोड़ा जा सकता है
4) राजनैतिक नेतृत्व अधीरता में गलती कर जाता है

पर प्रश व जिज्ञासा यह है की:-

1) क्या आंदोलन खत्म हो जाएगा ?
2) लाल किले के अपराधियों का क्या होगा ?
3) विदेशी फंडिंग के स्रोतों का क्या होगा ?
4) किसानों व इनकी फसलों के दलालों की भूमिका क्या रहेगी ?
5) क्या किसान कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग नहीं करेगा ?
6) क्या मंडी व मंडी के आढ़तियों का खेल वैसा ही रहेगा ?

शायद अब कोई नया आंदोलन खड़ा हो कि किसानों को मध्यस्तों से बचाओ .....पर उस आंदोलन को जाती- समूह से नहीं जोड़ा जा सके और शायद उसके लिये फंडिंग न हो .....अपन को क्या ? न खेत...न खलियान ।

सरकार ने गुरु पर्व पर कानून वापसी की घोषणा कर , राजनैतिक वर्ग पर अपना निशाना लगाया है....कितना लगा यह समय बतायेगा पर यह तय की भारत मे सरकारों की टक्कर का प्रभावी वर्ग जाती- समूह हैं बशर्ते कि उस सरकार को उस वर्ग में हित हो ।


जिस वर्ग को जैसा लगा उसे उसी रूप में बधाई....सब खुश है...कौन जीता कौन हारा ....यह समय तय करेगा ...बस भारत जीत जाये.... इस आंदोलन ने बहुत से रूप दिखा दिये.... बहुत से प्रकार सामने ला दिये......

बस भारत जीत जाये ।





Sunday, November 14, 2021

बाल दिवस .....कभी तो अपना भी था ।

बाल दिवस घोषित है अतः सभी को बाल दिवस की शुभकामनाएं । आज नहीं , तो कभी तो हम सब बच्चे थे ही ,बस उसी बचपन की याद में बाल दिवस की शुभकामनाएं ।

जब छोटे थे ,तो स्कूल में 14 नवम्बर के आस पास बाल मेला लगता था, बच्चों के द्वारा- बच्चों के लिये मेला । अच्छी तरह याद है , मेले में स्टॉल लगाते थे....टॉफी, चॉकलेट , टमाटर - सलाद चाट और समोसे..... एक समोसे के टो टुकड़े और दो दोने चाट तैयार ।

    हाथ रिक्शा पर चलने वाले सरदारजी की  सलाद चाट  पूरे शहर में प्रसिद्ध थी , तो अपनी  बाल मेले की दुकान के लिये दोस्तों के साथ इन्हीं से कुछ मसाला खरीदते थे और इसी में अंडे वाले कि दुकान से मसाला ला कर मिला लेते थे..... आखिर  व्यापार में बजट बहुत बड़ा विषय होता था । 7 दिन चलने वाले इस मेले अपनी पूर्व बचत पूँजी होती थी और मेले से हुई  बचत आने वाले  दिनों में खुद की दावत का जुगाड़ । 

साथ ही विद्यालय की प्रार्थना सभा मे बाल दिवस पर गुरु जनों के भाषणों के बीच कुछ विधार्थियो की कविता - भाषण औऱ जिंदाबाद । यही- इतना सा था बाल दिवस ।

पर समझ कभी नहीं आया, कि नेहरू जी चाचा क्यूँ घोषित हुए औऱ क्यूँ उनके जन्म दिन को बाल दिवस बना दिया । सम्भवतः राजनीति के किसी अनुयायी ने अपने नम्बर बनाने लिए इस दिन को बच्चों के नाम कर दिया ।

जिस देश मे भक्त प्रह्लाद , तर्कशील नचिकेता , वीर लव कुश , महान बलिदानी साहिबजादे ( गुरु गोविंद सिंह जी के पुत्र ) , शहीद खुदीराम जैसे......और भी बहुत सारे अनुकरणीय बच्चों की श्रंखला हो वहाँ एक खालिस राजनेता के नाम पर बाल दिवस ????? अपनी तो समझ से बाहर है , आप के समझ आता हो तो बताइये......

खैर तब तक जब तक कि 14 नवम्बर बाल दिवस है तब तक अपने खुद के बचपन के लिये शुभकामनाएं.....बचपन जिंदा रहेगा तो हम जिंदा रहेंगे । 

हाँ आप ने  बचपन मे बाल दिवस कैसे मनाया जरूर याद कर लेना और  यादें साझा कर लोगे तो लगेगा कि यादें - याद हैं ।


Saturday, November 13, 2021

लिखना तो है....

ब्लॉग से फेसबुक पर चलते हुए वापस ब्लॉग पर । अपनी बात को अपने  ही शब्दों में लिखने का तरीका .....फेसबुक के लंबे सफर के बाद ,लगा कि ब्लॉग ही सही है । हर किसी की अपनी राय- विचार- द्रष्टि है पर मेरे शब्दों में फेसबुक तात्कालिक प्रतिक्रिया का साधन है और ब्लॉग शब्दों को सहेज कर रखने की " किताब " ।

लिखना बहुत जरूरी है, लिखने से ज्यादा खुद के भाव को प्रकट करना ज्यादा जरूरी है । इस लिए नहीं कि मन के भावों का बाजार में कोई महत्व देगा ,  बल्कि इस लिये की भावों  को  कहीं लिखा नहीं, अभिव्यक्त नहीं किया तो भावों का भाव क्या रहेगा । यहाँ भी अपनी अपनी दृष्टि....यह मेरी बात है ।

लिखना बहुत जरूरी है , लिखना बन्द तो पढ़ना बन्द , लिखना बन्द तो सोचना बंद ,लिखना बन्द तो खुद का मूल्यांकन बन्द । लिखेंगे तो ही तो  पढ़ेंगे..कभी अपना ही , तो कभी किसी औऱ का ....पढ़ेंगे तो ही तो सुधरेंगे । सुधरेंगे नहीं तो बढ़ेंगे कैसे ?

तो इसी लिये लिखना जरूरी है ,खुद को अभिव्यक्त करना जरूरी है....फेसबुक की तात्कालिक जिंदगी में बहस है, उलझन है कभी कभी स्वागत- तिरस्कार है , शायद ब्लॉग की जिंदगी लम्बी है - गम्भीर है , समझदार है ....ना हो , तो भी कभी हो जाएगी । पर जो लिखा जायेगा वह सदैव सामने होता है ...हमेशा हमेशा ।

तो बस अभी यहीं डेरा है ...यही लिखेंगे....खुद को सुधारेगें....खुद को अभिव्यक्त करेंगे....फेसबुक पर केवल घूमनें चलेंगे ....रोज रोज ।

Friday, May 15, 2020

मजदूर .. मजबूर ।।

वो सत्ताएं दिलाता है पर उसकी सत्ता कभी न थी ,
वो आशियाने बनाता है ,पर अपना आशियाना कभी न था  ,
वो कहानी के शब्द बनता है , पर उसकी खुद की कहानी कभी न थी । ।

मजदूर पलायन कर रहे हैं और उन्हें तकलीफ में देख हर किसी का दर्द स्वभाविक भी है । कहीं सड़क पर बच्चे का जन्म तो , सूटकेस पर  बच्चे  को बैठा लंबी  यात्रा पर निकली माँ ।  किसी की साइकिल ही उसकी BMW बन गई तो कोई अपने बेलों के साथ या हाथ रिक्शे में ही अपने परिवार को समेट अपने गांव चल पड़ा । दुर्भाग्य की कहीं रेल पटरी पर सो रहे कुछ लोगों के ऊपर से ट्रेन  निकल गई तो कुछ लोग सड़क दुर्घटना के शिकार हो गये ।

आपदा में जब सब बन्द होता चला गया,  तो वह भी अपने घर निकल पड़ा । शुरू में तो केवल अपने कदमो के भरोसे । सत्ताओं ने होश सम्भाल कर ,इन्हें भी सम्भालना शुरू किया तब भी इसने भरोसा नहीं किया । लगा कि  अपने गांव ही चलूँ।  हक है उसका ,जहाँ चाहे वहाँ रहे । तुम्हारे शहरों - अट्टालिकाओं की सेवा का ठेका उसने नहीं लिया है । जब दिल्ली जैसे शहरों में एक रात में लाखों लोग एक जगह इक्कठे हो गये , तब ही समझ आ जाना था कि इन बड़े शहरों में हर कोई अनजाना है ।

 जो समाज ,इन को रोजगार देने की बात करता है सच्चाई तो यह है कि इस समाज के घरों, दुकानों , कारखानों , खेतों , तक को ये प्रवासी अपने " होने " से ही चलाते हैं । अब वे अपने घरों को चल पड़े , एक भय जो घटना से उठा और एक भय जो इन मे रोपा गया ।

सैकड़ों किमी यात्रा का साहस करने वाले इस वर्ग में इतना साहस तो है कि खुद को सम्भाल लेगा  । पर अब जब यह  कभी वापस आएगा तो क्या इस समाज मे भरोसा ढूंढ पायेगा ?

जानता हूँ समाज के एक वर्ग ने  जाते या अब भी रह रहे इस वर्ग को सम्भाला है , उनके भोजन- रहने - व यात्रा की भी व्यवस्था की है । शुरू की भगदड़ के बाद तत्काल इनके निवास , बसों से गंतव्य की यात्रा , बाद में रेलों की व्यवस्था हुई और अधिकांश की यात्रा सुगम हुई है पर अब भी काफी लोग सड़क पर हैं।

वे इतनी सरकारी व्यवस्थाओं के बाद भी सड़क पर हैं ...गांव-शहर-जिला - राज्यों की सीमाएं पार कर रहे हैं । कितनी पुलिस नाके ,चौकी , कितनी राजनैतिक परिधियाँ वे लांघ रहे हैं ....पर  खबर तो तभी उठती है, जब उन्हें खबर बनना हो अन्यथा आपने घर को निकल पड़ा यह " दृढ़ निश्चयी " तो चला जा रहा है , खुद पर रोटियाँ सेकने वालों को रोटी का मौका देकर । काश , सत्ताओं व समाज ने इस वर्ग को  यही रुकने के लिये भरोसा दिलाया होता ।

चाहता हूँ ,की वे जहां है वहीँ रहें । उनका रोजगार - भोजन यही तो है पर जानता हूँ कि वे तो मन के मोला है , यह उनका हक भी है , जहाँ चाहें वहाँ रहें .....पर इन मजदूरों को इनके हकों से दूर रखने वाले जब इनके पैरों की फोटो दिखा कर प्रश्न उठाते हैं तो लगता है कि लाशों पर मंडराने वाले गिद्ध अपना भोजन तलाश रहे हैं ।

Tuesday, April 14, 2020

राम.....मेरे राम

राम....दो शब्द जो भारतीयता में जीवन से लेकर मृत्यु तक , स्वागत से लेकर विदाई तक , उत्सव से लेकर मोक्ष तक पार लगाते हैं । इक्वाक्षु कुल भूषण राम ,  ऐसा जीवन पथ बना गये जो आज भी राजा - शिष्य - भाई- सखा- पति के रूप में आदर्श की परिकाष्ठा है ।

राम, जो जीवन तार दे ...राम जो अंदर की डोर को अंदर बैठे परमात्मा से मेल मिला दे...राम जो निराकार सर्व शक्तिमान को , आकार में साकार कर दे ।

राम..जो बचपन से लेकर आखरी गति तक केवल ओरों के लिये थे.....राजकुमार जो  कभी सुख से राज न कर पाये , पर इसमें भी उन्होंने आनन्द का भाव ले कर जीवन जीया ।

क्या ना था उनके पास ? फिर भी क्या ले कर चले ?  राम थे.... भगवान राम बन कर वन से वापस आये । निषाद- केवट- भील- वानर- रीक्ष - नाग - राकक्ष .... राम ,अकेले चले थे पर जब आये तो ये सब उनके प्रिय थे , सही में  अब ये सब उनकी आत्मा थे ।  वापसी पर , वही वन वासी हनुमान ही तो राम तक पहुंचने के मार्ग बन गये .... शायद इसी राम हनुमान का सखा प्रेम है,  कि भारत में राम से ज्यादा मंदिरों में  हनुमान पूजित  हैं ।

राम क्यूँ राम है ....  हम कल्पना से सिहर उठेंगे जब सुबह मिलने वाले राज मुकुट की जगह वन गमन के आदेश मिल जाये... जिसको चतुरंगणि सेना , दुनिया के सारे भोग मिलने वाले हों , वह पिता के आदेश पर सब कुछ छोड़ वन को चल पड़े , बिना किसी विरोध- बिना किसी आक्षेप के । जिस माँ ने यह परिस्ताथि पैदा की वह भी उनके लिये हमेशा प्रथम पूज्य माँ रही । इतनी की वन से आपसी पर भी सर्व प्रथम उसी माँ से मिलने पहुंचे । जो जनता उनके इशारे पर कुछ भी कर गुजरने को तैयार हो...उसे पिता - जन्म भूमि की सेवा का आदेश दे वे वन को चल पड़े ।

वे बाली वध कर के भी बाली के प्रिय थे , उसके पुत्र के संरक्षक थे ,  जिनके लिये सीता प्राण प्रिय हैं पर जिनका राज कर्तव्य पति के निजी कर्तव्य से ज्यादा राजा व प्रजा के भाव पर टिका है ।

राम ...उस  माँ शबरी के प्राण हैं जिसने अपना जीवन राम राम में निकाल दिये और जब मिले तो समर्पण में अपने जुटा बेर राम को खिला दिये ताकि कोई खट्टा बेर राम को न मिल जाये ।


राम....जिसने 14 वर्ष के वनवास को ऐसे आनन्द से जीया की जब लौटे तो  राम - राम न रहे , भारत के आराध्य राम बन गये.... ऐसे राम जिन्हें जाने बिना कोई भारत का नहीं हो सका । किसी ने उन्हें निराकार ईश्वर का नाम माना तो किसी ने साकार ईश्वर ...किसी ने सखा तो किसी ने प्राण ...

राम तो अनन्त हैं....आनन्द हैं ।।

Tuesday, March 3, 2015

धारा 370


संविधान का यदि कोई अनुच्छेद सबसे विवादित हे तो वह हे 370 । अपनी उत्पत्ति से लेकर अब तक यह विवादित ही रहा हे । पर यह हे क्या ,यह भी कम जानकारी के अभाव में विवादित ही रहा । चार प्रश्न हे
1) अनुच्छेद370 हे क्या ।
2) इस का प्रभाव क्या हे
3)ओर क्या इस को हटाया जा सकता हे ।
ओर
4) क्या यह कश्मीर व् भारत के विलय का सूत्र हे ।

   यह धारा संविधान के 21वें भाग में समाविष्ट है जिसका शीर्षक है- ‘अस्थायी, परिवर्तनीय और विशेष प्रावधान’ (Temporary, Transitional and Special Provisions).
    धारा 370 के शीर्षक के शब्द हैं - जम्मू-कश्मीर के सम्बन्ध में अस्थायी प्रावधान (“Temporary provisions with respect to the State of Jammu and Kashmir”)
    अर्थात संविधान बनाने वालो ने ही इसे अस्थाई प्रावधान माना था ।
     परन्तु इसे सबसे ज्यादा विवादित बनता हे इस का अनुच्छेद-35(A)  इस अनुच्छेद में कहा गया की जम्मू कश्मीर की विधानसभा स्थाई निवासी को परिभाषा निश्चित करे ओर शेष लोगो के अधिकारों को सीमित करे ।ओर इस पर भी सबसे बड़ा विवाद यह की इस अनुच्छेद को राष्ट्रपति के संवेधानिक आदेश 1954 से जोड़ा गया । वास्तव में इसे नहरू व् अब्दुल्ला की आपसी बैठक के बाद 1954 लाया जाना निश्चित किया गया था ।
           हटाया जाना-धारा 370 का उप अनुच्छेद 3 बताता है कि ‘‘पूर्ववर्ती प्रावधानों में कुछ भी लिखा हो, राष्ट्रपति प्रकट सूचना द्वारा यह घोषित कर सकते है कि यह धारा कुछ अपवादों या संशोधनों को छोड दिया जाये तो समाप्त की जा सकती ह़े ।
      विलय का सूत्र:- एक बड़ा भ्रम यह भी हे । भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के अंतर्गत जम्मू कश्मीर के राजा व् अन्य राजाओ को भारत या पाकिस्तान में विलय का विशेषाधिकार प्राप्त हुआ था । जम्मू कश्मीर के राजा ने इसी विशेषाधिकार का उपयोग कर विलय पत्र ( Instrument of Accession ) पर हस्ताक्षर किये । जिससे यह भारत का अभिन्न अंग हो गया । 370 को इस से जोड़ना मात्र भ्रम फैलाना हे ।
       धारा 370 ने जम्मू कश्मीर के लोगो के जीवन पर काफी बुरा प्रभाव् डाला हे । समय हे इस को जानने व अवलोकन करने का राजनीती विचारधारा से परे ।

Monday, February 2, 2015

जाती परिवर्तन ।




शूद्रो ब्राह्मणात् एति,ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम्|
क्षत्रियात् जातमेवं तु विद्याद् वैश्यात्तथैव च||
(मनुस्मृति १०:६५)

जो शुद्र कुल में जन्म ले कर ब्राह्मण  ,क्षत्रिए ओर वैश्यो  के समान गुण कर्म स्वभाव वाला हो तो वह  अपने गुण के आधार पर  ब्राह्मण, क्षत्रिए ओर वैश्य बन जाये । ओर वेसे ही जो ब्राह्मण क्षत्रिए ओर वैश्यो कुल में उत्पन्न हुआ हो लेकिन उसके गुण ,कर्म , स्वभाव शुद्र के समान हो तो वह शुद्र बन जाए ।अर्थात चारो वर्णों में जो पुरुष स्त्री के गुण जिस वर्ग के समान हो वे उसी वर्ग में समझे जाए ।

अर्थात जाती जन्म से नही कर्म से बनती थी ओर कर्म से परिवर्तित होती थी ।  परिणाम स्वरुप एक ही गोत्र  विभिन्न जातियों में मिल जाते हे ।

पर समय बदल गया... वर्ण जाती बन गये , जाती जड़ हो गई.... अब तो जाती मतलब जो जाती नहीं 

Sunday, February 1, 2015

धर्म परिवर्तन... जिम्मेदार कोन ।


ईसाई मिशनरियो की गतिविधि किस तरफ ओर किस तरह बढती हे , यह पता था । आदिवासी व् दूरदराज के ईलाके इन के आसन निशाने थे पर कुछ समय से राजगढ़ में भी इन्हें सक्रिय होता देख रहा था । ngo के चहरे के नीचे एक बड़ा  संगठन यहाँ सक्रिय हो गया हे , जिस का चिन्ह भी धार्मिक चिन्ह हे ।आज झटका लगा जब एक अस्पस्ट जानकारी मिली की एक परिवार ने अपनी उपासना पद्धति परिवर्तित करी हे । अगले रविवार को इस परिवार से मिलना तय हुआ हे।
    पर मुद्दा इस से कुछ अलग हे । इन ईसाई मिशनरियो या इस तरह के NGO को जो विदेशी मदद मिल रही हे उस का समाधान क्या हे । क्या समाज इन  घटनाओ पर सक्रिय होगा । मेरा मत स्पस्ट हे , आप अपने विचारो से किसी भी उपासना पद्धति को अपना सकते हे । पर विचारो को बनाने या बिगाड़ने का काम प्रलोभन या सेवा की आड़ में किसी को नहीं करना चाहिए ।
       मेरी दिक्कत ये मिशनरियां नही बल्कि भारतीय वर्ग की अपने लोगो के प्रति उदासीनता हे । बड़े बड़े भंडारे या धार्मिक आयोजन की जगह यदि वंचित वर्ग पर यह धन खर्च हो तो , न केवल व्यापक समाज आगे बढ़ेगा बल्कि इस तरह की समाज  घाटी घटनाओ में भी रोक लगेगी । पर अफ़सोस हे की समाज के पास बाबाओ के आयोजन के लिए धन उपलब्ध हे पर इस दरिद्र नारायण के लिए तंग हाथ । हम यदि जिम्मेदारियों के प्रति नही चेते तो समस्या के आगमन पर उस के प्रभाव के किये  तॆयार रहना  चाहिए ।
     आज भी यह घटना संघ स्वयं सेवक के रूप में सामने लाई गई ओर  संघ को ही समाज के लिये चिंतित व स्कछम समझा जाता हे इस पर हर्ष  मिश्रित प्रश्न था की किस रूप में हम काम कर सकते हे । सक्रिय वनवासी कल्याण परिषद , विद्या भारती , के माध्यम से या किसी ओर रूप से ।

Saturday, January 31, 2015

"स्टाफ "..भारतीय रेलवे का फ्री पास ।


"स्टाफ "भारतीय रेल में सफर यदि कर रहे हो तो इस शब्द की बड़ी महिमा दिखेगी । आप के पास टिकट न हो , बस यह एक शब्द आप के पास कहने का दम  हो तो TT या कोई चेकिंग स्टाफ , आप का टिकट देखने व पूछने की भी जरूरत नही समझता ।
         आज भी ट्रेन में 7 "जबरू " स्टाफ शब्द की महिमा के साथ सफर पर थे ,  TT साहब को स्टाफ बोल कर पूर्णाहुति कर ली ।
 हाँ मजेदार ये की दिल्ली में सरकारी नोकरी करने वाले ये जबरू बड़े जोर शोर से मोदी के विरोधी भी थे , कारण सुबह time पर ऑफिस जाना पड़ रहा हे । वैसे केजरी के लिये यह समुदाय वोटर हो सकता हे ।
    बाकी लोग केवल "स्टाफ "शब्द की महिमा पर ध्यान   लगायें ।

वापसी

सालो हो गये यहाँ आये हुए । फेसबुक - ट्विटर की तुरंत फुरंत की दुनिया अल्पकालिक तो ठीक हे पर संतोषप्रद नही । वहां तत्काल भाग दोड के साथ उपलब्धता हे । पर यहाँ शांति के साथ सामर्थ्यपूर्ण यात्री ।
        समय कितना बदल गया । सत्ता के साथ देश का जन मानस भी । परिवार के साथ सामाजिक जीवन भी । बदलाव , विचार ओर अपने मन को अभिव्यक्त करने के साधन व तरीके भी बदल गए । ब्लोगिंग की पुन्ह  शुरुवात इन को महसूस व् अभिव्यक्त करने में सहायता करेगी ।

Friday, March 23, 2012

नव वर्ष कि हार्दिक शुभकामना

नव वर्ष कि हार्दिक शुभकामना ... सम्वंत २०६९ देश , संस्कृति , ओर आप के परिवार के लिये शुभ व् मंगलमय हो


वर्ष प्रतिपदा विक्रम सम्वंत 2069 का प्रथम दिन " शक्ति उपासना का प्रारंभ " ओर भगत सिंह , सुखदेव ओर राजगुरु का बलिदान दिवस 23 मार्च ..एक दिन ...देश के आतितायियो सावधान ...इश्वर का इशारा अब भी समझ जाओ.....कुर्सी छोड़ो कि जनता आती हे

Monday, February 6, 2012

बस एक ही बात " डॉ . स्वामी को भारत रतन मिले "

अकेला चना भाड़ छोक सकता हे ॥ सीबीआई से लेकर सरकारी तन्त्र को सर्वोच्च न्यायालय से अपनी बात मनवाने वाले डॉ स्वामी को धन्यवाद .

Monday, February 7, 2011

बसंत.. अज्ञान से ज्ञान कि ओर एक कदम ॥

" या कुन्देन्दु तुषार हारधवला या शुभ्रवस्त्राव्रता , या वीणावर दंड मण्डितकरा या श्वेतपधमासना |
हस्ते स्फाटिकमालिकं विदधति पध्मासने सन्सिथ्तां | वन्दे तां पर्मैश्वरी भगवति बुधिप्रदां शारदाम॥ "

त्रि देवियों मे भगवती सरस्वती विधा ,ज्ञान ओर वाणी कि देवी हे तथा वाक़ , वाणी , गिरा, भाषा , शारदा , गो , सोम लता , वागदेवी , वागीशवरी आदि नामों पूजित हे | बसंत पंचमी के पर्व पर आप को नमन ओर सभी को बधाई |

हे भगवती इस बसंत पंचमी पर आप को पुकार रहा हूँ , इस भारत वर्ष पर अपनी कृपा करो | बचपन मे याद हे कि इस दिन पीले कपडे पहनने को मिलते थे , अपने स्कूल मे भी आप कि पूजा - पीले फूलो से कर आशीष मांगते थे , घर पर भी के तरह के मीठा - नमकीन पीले चावल बना करता था , आप कि पुत्री ये प्रकर्ति भी फूलो से पैड पोधो को धक् कर आप को नमन करती थी , ज्ञानी - अज्ञानी आप से बुद्धि - विवेक का आशीष माँगा करते थे |

पर पता ही नहीं चला कि आपने कब अपनी कृपा का हाथ इस भारत वर्ष से उठा लिया ओर तब से ही इस देश के बुरे दिन आ गये , देश के नेताओ के लिये आप कि पूजा सांप्रदायिक , तेजी से आगे बढ रही युवा पीढी के लिये पुरातन परंपरा , तथाकथित व् स्व घोषित बुधिजिवि वर्ग के लिये हिंदूवादी हो गई , प्रकर्ति को हम ने ही समेट दिया - जहा खेत थे वहा फैक्ट्री ओर पार्को कि जगहे बड़ी बड़ी बिल्डिंग बन गई , |

माँ , पर हम साधारण भारत वासी यों से क्या नाराजगी , हर तरफ से लुट पिट रहे इस आर्य व्रत के हर निवासी कि तरफ से मेरी प्राथना हे कि हमारे अज्ञान ओर जड़ता को दूर करने लायक ज्ञान का प्रकाश हमे दो | हम किताबी ओर रोटी जूगाडु ज्ञान के अंधकार से बाहर आ कर इस देश को तथा विव्श्व कि सबसे पुरानी मानव सभ्यता को एक नई दिशा दे पाये | एक एसा समाज बनाये जहा ज्ञान का मतलब समाज से कटना नहीं बल्कि समाज का खवैया बनना हो ओर जो समाज देश मे बढ़ ते भष्टाचार ओर सामाजिक उदासीनता पर अंकुश लगा पाये |
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Wednesday, September 9, 2009

अब धर्म निरपैक्छ्ता को खतरा नहीं



महाराष्ट्र के सांगली जिले मे गणेश जी विसर्जन नहीं हो पा रहा है मूर्तिया खंडित की जा रही है , मिराज ओर जिले के दूसरे हिस्सों मे सांप्रदायिक तनाव है हिन्दू आस्था पर चोट की जा रही है पर कही कोई खबर नहीं कोई विरोध नहीं . सांप्रदायिक तनाव का कारण है की किसी गणेश पंडाल मे शिवाजी महाराज के हाथो से अफज़ल खान के वध की प्रदर्शनी लगी हुई थी , ये अफज़ल वर्तमान का अफज़ल नहीं शिवाजी के समय का है



महाराष्ट्र मे इतना सुब कुछ हो गया पर कही कोई हल्ला नहीं , गोपीनाथ मुंडे को एयर पोर्ट पर रोकने पर हुऐ हल्ले पर जरूर एक दिन खबर दी गई पर कही के उल्लेख नहीं था की सांप्रदायिक तनाव के चलते गणेश विसर्जन ही रुका हुआ है , ओर देखिये विवाद का विषय भी इतिहास की एक सत्य घटना . अब शिवाजी महाराज पर भी लोगो को आपति होने लगी ओर आपति की हद भी इतनी की हिन्दू आस्था पर ही चोट कर दी , गणेश मूर्तियों पर पत्थर उछाले गये
हिन्दू धर्म पर चोट से इस देश की धर्म निरपैक्छ्ता को बल मिलता है तभी तो न मीडिया मे ओर न ही तथाकथित धर्म निर्पैक्छ्ता के तैकैदारो को कोई परेशानी हुई , इन से मुझे कोई उम्मीद भी नहीं है पर भारत का आम आदमी - ये कब तक सोता रहेगा , महाराष्ट्र मे चुनाव है इस तनाव को भी हिन्दू संगठनो से जोड़ दिया गया , गणेश मंडलों को शिवाजी व् अफजल का पोस्टर लगाने पर नोटिस दिया गया , मुस्लिम वोटो के लिये शिवाजी द्वारा अफज़ल वध के पोस्टर हटा दिये गये ओर मूर्तियों पर पथराव को पुलिस देखती रही ताज्जुब कही कोई खबर ही नहीं

क्या हिन्दू की बात करने से इस देश की शांति भंग हो जाती है , सोचिये जरा यदि कुछ ऐसा ही किसी मुस्लिम या ईसाई आस्था पर हुआ होता तो देश की संसद से लेकर मीडिया ओर सड़क छाप धर्म निर्पैक्छ्ता के तैकैदारो का क्या हाल होता . ये केवल हिन्दू या मुस्लिम की बात नहीं है , सही ओर गलत मे अंतर की बात है , अफज़ल खान जैसे लोगो मे अपना नेत्रत्व तलाश करने की बात है , फिर भी इस देश मे अल्पसंख्यक "खतरे" मे है

Sunday, August 23, 2009

"मेरे घ्रर आई एक नन्ही परी"


मेरी बिटिया , बहुत इंतजार कराया है इसने पर कहते है ना कि इंतजार का फल मीठा होता है , इसके नन्हे कदमों ने पूरे परिवार मे खुशिया बिखेर दी है , बिटिया के रूप मे लक्ष्मी जो आई है ( इसकी पडदादी ने इसको इसी नाम से पुकारा है )

Thursday, August 13, 2009

तिरंगे कि दूर्दशा




(ये फोटो दिल्ली जोधपुर इंटरसिटी ट्रेन मे लिया गया है , ओर ज़रा खिड़की के पास टके थैले को देखिये , जी हाँ ये तिरंगा है हमारा राष्ट्रीय ध्वज )

राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे कि इस दशा पर आंसू आ रहे है उस से ज्यादा इस उन्नत ओर आगे बढ़ रहे देश के हालात पर , लाखों शहीदों कि कुर्बानियों पर मिली इस आज़ादी मे हम अपने लोगों को मूलभूत न तो बाते बता पाये ओर न ही मूलभूत सुविधा - शिक्छा दे पाये , मुझे इस ओरत से कोई नाराजगी नहीं है उस को तो तिरंगे ओर दूसरे कपडे मे कोई अंतर ही नहीं मालूम , पर अफ़सोस है ट्रेन के टीटी , रेलवे पुलिस के जवान ओर सामने कि बर्थ पर बैठे भी पढे लिखे लोगों पर जो तिरंगे कि दुर्दशा को देख उसे एक प्रदर्शनी बनाये हुई थे , किसी ने उस अनपढ़ महिला को टोका भी नहीं , जैसे ही उस को बताया उसने इस को खली कर दूसरे थैले मे रख भी लिया


पर यदि आज़ादी के 60 साल बाद भी हमारी जनता इस से अनभिज्ञ है तो कोन दोषी है , देश का नेत्रत्व करने वाले नेता - अफसर या आप ओर हम , हम चाँद ओर मंगल , तेजी से बढती अर्थव्यवस्था , कि बात करते है पर इस फोटो को देख कर सोचिये जरा ,कि क्या हम वाकई आगे बढ़ रहे है , क्या हम ज्यादा ही आजाद हो गये है या हम आज़ादी का पर्व मनाने का हक रहते है ??

" स्वाधीनता दिवस कि सभी को शुभकामना ओर शहीदों को नमन , साथ ही भरोसा कि देश शहीदों के सपने वाला देश जरूर बनेगा "

Tuesday, August 11, 2009

"राष्ट्रीय राजमार्ग पर आप का स्वागत है "

मार्ग भी कई तरह के होते है न , गाँव की पगडण्डी -सिंगल सड़क - राज्य सरकार के राजमार्ग ओर राष्ट्रीय राजमार्ग वैसे ही जैसे गाँव - क़स्बा -जिला ओर राजधानी , अब देश की वर्तमान स्थिति की चलते गाँव - क़स्बा -जिला मे सुविधाओ की तो उम्मीद छोड़ दीजिये पर राजधानी मे तो कुछ उम्मीद कर ही सकते है , पर वहां भी हाल बेहाल मिले तब ? राष्ट्रीय राजमार्ग पर उम्मीद की जा सकती है बढ़िया सड़क कि , वैसे सड़क है तो उस मे गड्ढा तो होगा ही , कही कही गड्ढो मे सड़क भी , लालू भी कभी पटना की सडको को ....के गालो की तरह बनाना चाहते थे पर बात केवल बात बन कर रह गई

अभी NH 8 पर रेवाडी से जयपुर जाना हुआ , राष्ट्रीय राजमार्ग की सुविधा के उपभोग के लिये आने जाने के लिये करीब 250 रुपे का टोल टैक्स भी दिया , पर गड्ढो से बचने के लिये अपनी कार की स्त्त्येरिंग को बार बार घुमाता ही रहा , नजर आस पास की गाडियों के आलावा सड़क के संभावित गड्ढो पर भी टिकी रही , जाते वक्त तो हालात को फिर भी कुछ टीक थे है पर जयपुर से वापसी के वक्त " है भगवान ". लग रहा था की किसी गाँव की सड़क पर है , वैसे गावों कि सड़क इस ज्यादा अच्छी है , इतने भारी टोल टैक्स का मतलब केवल सरकारी डंडे से वसूली लगा ,जयपुर से दिल्ली राजमार्ग दो राजधानियों को जोड़ने वाला - दो पर्यटक राजधानियों को जोड़ने वाला मार्ग है साल मे लाखों देशी विदेशी पर्यटक इस मार्ग पर सफ़र करते है .. . पर इस की हालात देख कर बहुत दुःख हुआ .. कहते है सड़क देश का आइना है , राजमार्ग की हालात देख इस आइने से क्या देखे समझ नहीं आता


जान का क्या है भाई जल्दी है , ऊपर की फोटो भी राष्ट्रीय राजमार्ग की ही है - करीब 100 की स्पीड पर चल रही इस जीप मे ये लोग पीछे लटक रहे है , यात्रियों को न तो अपनी सुरक्छा की चिंता है ओर न ही जीप चालको को पुलिस का भय .. ओर न ही पुलिस को अपने काम की याद .


वैसे राजमार्ग पर लगा बोर्ड अब भी कह रहा है "राष्ट्रीय राजमार्ग पर आप का स्वागत है "